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मृत आरक्षक के विधवा के खिलाफ जारी वसूली आदेश पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक

बिलासपुर। मृत आरक्षक के विधवा की याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने विभाग द्वारा जारी वसूली आदेश पर रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांत का हवाला देते हुए कहा कि सेवानिवृत कर्मचारियों से किसी भी प्रकार की वसूली पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। विभाग द्वारा की गई कार्रवाई नियम विरुद्ध है।

मृत कांसटेबल की पत्नी सुमित्रा भगत ने वकील अभिषेक पांडेय व घनश्याम शर्मा के जरिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। दायर याचिका में कहा है कि उसके पति सहलूराम भगत दूसरी बटालियन छत्तीसगढ सशस्त्र बल सकरी जिला बिलासपुर में पुलिस विभाग में कांसटेबल ;आरक्षकद्ध के पद पर पदस्थ थे। 19 अगस्त 2011 को उनकी मृत्यु हो जाने पर विभाग द्वारा उसे वर्ष 2011 से फैमली पेंशन की राशि भुगतान किया जाना प्रारंभ किया गया। पेंशन भुगतान के 12 वर्ष पश्चाम 10 फरवरी 2023 को मुख्य प्रबंधक भारतीय स्टेट बैंक रायपुर द्वारा उन्हें अधिक पेंशन भुगतान का हवाला देकर सुमित्रा भगत के पेंशन राशि से वसूली का आदेश जारी किया गया। अधिवक्ता अभिषेक पांडेय द्वारा हाई कोर्ट के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भगवान शुक्ला विरुद्ध यूनियन आफ इंडिया एवं अन्य के वाद में यह निर्णय दिया गया कि किसी भी सेवानिवृत्त कर्मचारी या पेंशनभोगी के पेंशन से वसूली का आदेश जारी किया जाता है। यह एक सिविल प्रक्रिया है एवं वसूली आदेश जारी किये जाने से पहले पेंशनभोगी को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब लिया जाना चाहिये एवं संपूर्ण जांच कार्यवाही के पश्चात गंभीर त्रुटि पाए जाने पर ही वसूली आदेश जारी किया जा सकता है। चुंकि याचिकाकर्ता एक पुलिस कांसटेबल की विधवा है एवं उसे सेवा नियम एवं अन्य कानूनों की कोई जानकारी नहीं है। यदि पेंशन कार्यालय के अधिकारियों द्वारा उन्हें अधिक भुगतान किया गया है तो इसके लिए उक्त पेंशन कार्यालय के अधिकारी एवं कर्मचारी जिम्मेदार हैं।

अफसरों से की जानी चाहिए वसूली

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि वसूली उन अधिकारी. कर्मचारियों के वेतन से की जानी चाहिये। जिसने लापरवाही बरती है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता के पेंशन से वसूली आदेश जारी किये जाने के पूर्व उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत किये जाने का अवसर नहीं दिया गया है। इसके साथ ही अधिक भुगतान के संबंध में कोई जांच कार्यवाही ना किये जाने से याचिकाकर्ता के विरूद्ध जारी वसूली आदेश निरस्त किया जाने योग्य है। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय के सिंगल बेंच में हुई। प्रकरण की सुनवाई के बाद जस्टिस पांडेय ने वसूली आदेश पर रोक लगा दी है।

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