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एम्स का आर्टिफिशियल जबड़ा सामान्य की तरह करेगा काम मरीजों को निश्शुल्क

रायपुर। राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डाक्टरों ने ऐसा जबड़ा विकसित किया है, जो सामान्य जबड़े की तरह दिखता और काम करता है। एम्स ने इसका पेटेंट भी करा लिया है। एम्स में इस जबड़े का रिप्लेसमेंट निश्शुल्क में होगा, जबकि आर्थोग्नेथिक सर्जरी के माध्यम से जबड़ा रिप्लेसमेंट के लिए मरीजों को करीब सवा लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। निजी अस्पतालों में यह खर्च पांच लाख रुपये तक आता है। एम्स ने अपनी शोध रिपोर्ट आइसीएमआर (इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च ) को भेज दी है।

आइसीएमआर ने इस शोध को आगे बढ़ाने और मरीजों की सहायता के लिए एक करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दी है। इसमें से 37 लाख रुपये एम्स को मिल भी चुके हैं, जिसकी मदद से मरीजों को जबड़ा लगाया जाएगा। एम्स के डेंटिस्ट्री, पल्मोनरी और फिजियोलाजी विभाग के विशेषज्ञों की यह खोज विकृत जबड़े के साथ पैदा होने वाले हजारों मरीजों के लिए वरदान साबित होगी। विशेषज्ञों का दावा है कि भारत में अब तक केवल मुंह खोलने और बंद करने वाले रिप्लेसमेंट उपलब्ध थे। टाइटेनियम धातु से एक खास ज्वाइंट रिप्लेसमेंट इम्प्लांट या नकली जबड़ा बनाया गया है, जो बिल्कुल सामान्य जबड़े की तरह काम करता है।

चेहरे पर पड़ता है प्रभाव

आइसीएमआर को रिपोर्ट भेजने से पहले एम्स के विशेषज्ञों ने 13 मरीजों पर इसका प्रयोग किया, जो सफल रहा। एम्स के विशेषज्ञों ने इसमें 23 से 40 साल के उम्र के लोगों को शामिल किया था। विशेषज्ञों का कहना है कि टीएमजे एंकोइलोसिस में लंबे समय तक मुंह नहीं खुल पाता है। इसका असर चेहरे पर भी पड़ता है और वह छोटा हो जाता है।

तीन साल में सफल हुई मेहनत

ज्वाइंट रिप्लेसमेंट इम्प्लांट तैयार करने वाले डा. संतोष राव का कहना है कि वह विगत तीन सालों से लगे हुए थे। मेहनत सफल हुई है। 13 मरीज लाभान्वित हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि सर्जरी में डेटिस्ट्री विभागाध्यक्ष डा. विराट गल्होत्रा मरीज के दांत के आकार का परीक्षण करते हैं। सामान्य सांस और नींद की जांच पल्मोनरी मेडिसिन विशेषज्ञ डा. दिवाकर साहू करते हैं। फियोलाजी विशेषज्ञ डा. एकता खंडेलवाल मरीज के चबाने की ताकत और खाना गटकने की क्षमता का अध्ययन करते हैं। एनेस्थिसिया से डाक्टर एनके अग्रवाल और उनकी टीम का सहयोग रहता है।

प्रदेश में ज्यादा मरीज, 16 कर रहे इंतजार

डाक्टरों का कहना है कि सामान्य प्रसव के दौरान मां के गर्भाशय के मुहाने से बच्चे को खींचकर निकालते समय हुई असावधानी के कारण होती है। देश में दो हजार में से एक बच्चे में यह समस्या देखी जाती है। प्रदेश में इसकी संख्या फिलहाल ज्यादा है। इसके लक्षण तीन से 15 साल की उम्र में दिखते हैं। मुंह का आकार बिगड़ जाता है और भोजन चबाने में परेशानी शुरू हो जाती है। एम्स में नकली जबड़े की सर्जरी के लिए अभी 16 मरीज इंतजार में हैं।

एम्स के सभी विभागों में मरीजों के इलाज के साथ बहुत सारे रिसर्च कार्य भी होता है। ज्वाइंट रिप्लेसमेंट इम्प्लांट से मरीजोंं को काफी फायदा होगा। आयुष्मान योजना के अंदर आने पर यह इम्प्लांट भी निश्शुल्क होगा।

-डा. नितिन एम. नागरकर, निदेशक, एम्स, रायपुर

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