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मध्यप्रदेश

नन्ही-सी उम्र में चढ़ गए माउंट एवरेस्ट पर्वत पर…इसे डाउन नहीं अपसिंड्रोम कहिए

 इंदौर। दुनिया भले ही उन्हें डाउन सिंड्रोम से ग्रसित कहे, लेकिन उनके कारनामे ऐसे-ऐसे हैं कि लगता है वे डाउन नहीं बल्कि अप-सिंड्रोम वाले बच्चे हैं। वे सामान्य बच्चों से ज्यादा कमाल करते हैं। केवल सात वर्ष की उम्र में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ जाते हैं, तो कहीं संगीत, खेल और तकनीक में अपना अलग ही मुकाम बना लेते हैं। आइए आज विश्व डाउन सिंड्रोम डे पर पढ़ते है जिद, जज्बे और जुनून की कुछ ऐसी कहानियां जिन्होंने जीत पाकर ही दम लिया।

डाउन सिंड्रोम से ग्रसित इंदौर के बच्चे व युवा राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर मिसाल बन रहे है। इस तरह के क्रोमोसोम डिसआर्डर वाले बच्चों को यदि विशेष देखभाल, प्रोत्साहन व प्रशिक्षण मिले तो वो भी सामन्य बच्चों की तरह अलग-अलग क्षेत्रों में बेहतर मुुकाम हासिल कर सकते है। डाउन सिंड्रोम से ग्रसित अवनीश को महू में रहने वाले आदित्य तिवारी ने सिंगल पेरेंट्स के रूप में अनाथ आश्रम से गोद लिया था।

अवनीश की बेहतर परवरिश व देखभाल का ही नतीजा है कि उसने 7 साल की उम्र में अपन दत्तक पिता आदित्य के साथ माउंट एवरेस्ट की 5550 मीटर ऊंचाई तक पहुंचकर एक रिकार्ड बनाया। अवनीश को 3 दिसंबर 2022 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों सर्वश्रेष्ठ बाल दिव्यांग पुरस्कार मिला था।

साइकिलिंग प्रतियोगिताएं जीती और ग्राफिक्स डिजाइनिंग में बना रही करियर

20 साल प्रथा भालेराव को डाउन सिंड्रोम की समस्या है। इसके बाद भी वह सामान्य बच्चों की तरह बेहतर काम कर रही है। वे स्वावलंबी बन चुकी है और वर्तमान में ग्राफिक्स डिजाइनिंग में डिप्लोमा कर रही हैं। वे कैफे में स्टाक मैनेजमेंट का काम करती है। उन्हें साइकिल चलाने का शौक है और वे सामान्य बच्चों के साथ में कई साइकिल प्रतियोगिताओं को जीत चुकी है। प्रथा की मां शिल्पा भालेराव के मुताबिक बचपन से ही वह कंप्यूटर फ्रेंडली रही है। वह मोबाइल एप्लीकेशन को बेहतर तरीके से चला लेती है। तकनीक से जुड़ाव के कारण वो अपना करियर ग्राफिक्स डिजाइनिंग में बनाना चाहती है। शिल्पा भालेराव के मुताबिक डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चों परेशानियों को स्वजन समझें।

12वीं की परीक्षा दे रहा पार्थ और ला फर्म में कर रहा नौकरी

17 साल के पार्थ जैन ने 16 साल में 10 वीं परीक्षा पास की है और अब वे 12 वीं की परीक्षा देंगे। उनकी मां गर्विशा जैन बताती है जब पार्थ 10 माह का था तब उसे हम यूएसए लेकर गए थे और वहां उसे अर्ली इंटरवेंशन थेरेपी करवाई। 10 साल वहां रहने के बाद मैं आई और स्लो लर्नर बच्चों के लिए एक थेरेपी सेंटर व स्कूल भी शुरु किया। पार्थ टेबल टेनिस व फुटबाल खेलता है और अब वह एक ला फर्म में काम कर रहा है। गर्विशा बताती हैं कई माता-पिता डाउन सिंड्रोम या स्लो लर्नर बच्चों की परेशानी को समझ ही नहीं पाते है कि उन्हें थेरेपी कितनी जरूरत है। जिन बच्चों को सही तरीके से थेरेपी व स्कूली की पढ़ाई मिलती है वो स्वावलंबी बन सकते है। ये सामान्य बच्चों के समान लिख-पढ़ सकते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी को लिखा पत्र

21 वर्षीय अक्षत तबला व सिंथेसाइजर बजाते है। मां आरती घोड़गावंकर बताती हैं कि अक्षत ने नासिक में दो साल वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षण लिया। इंदौर में दीए व लिफाफे बनाकर बेचे और उन रुपयों से मोबाइल खरीदा। विशेष बच्चों की हुई प्रतियोगिता में उसने गोला फेंककर पुरस्कार भी पाया था। उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी एक पत्र लिखा है जो हम उन्हें जल्द भेजेंगे।

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