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मध्यप्रदेश

आल्हा के भक्तिभाव से प्रसन्न होकर मां शारदा ने दिया था अमरता का वरदान

मैहर। कहते हैं न कि सच्चे मन से मांगों तो ईश्वर भी मिल जाता है। ऐसा ही हुआ था मां के भक्त आल्हा के साथ। ऐसी मान्यता है कि जब उसने मां का आर्शीवाद पाने के लिए कठोर तपस्या की तो दस वर्षों के बाद मातारानी उस पर प्रसन्न हुईं और दर्शन दिए। मान्यता है कि मातारानी ने आल्हा की भक्तिभाव से प्रसन्न होकर उसे चिरकाल तक भक्ति और अमरता का वरदान दिया। माना जाता है कि उसके बाद ही मां की प्रतिमा आल्हा को मिली और मां शारदा के इस मंदिर का निर्माण हुआ। मंदिर के निर्माण से लेकर कहा जाता है कि मां की पूजा- अर्चना सबसे पहले आल्हा ही करते आए हैं। कहते हैं कि जब प्रात:काल में मंदिर के पट खोले जाते हैं तो वहां मां के चरणों में जल के साथ ही एक फूल चढ़ा हुआ मिलता है।

आज भी इस मंदिर में चढ़ता है आल्हा का प्रसाद

हालांकि आज तक कोई भी आल्हा को देख नहीं सका है। माता मंदिर के बारे में मान्यता है कि जो भी रात में इस मंदिर में आल्हा को देखने के लिए ठहरा है उसकी मृत्यु हो गई। इस डर के कारण रात में इस मंदिर में कोई नहीं ठहरता है। मंदिर के पुजारी भी यहां रात में नहीं ठहरते हैं। पुजारी बताते हैं मंदिर को खोलने का समय सुबह चार बजे का है तभी मंदिर में प्रवेश किया जाता है। बताते हैं कि अक्सर ही मंदिर के दृश्य को देखकर लगता है जैसे कोई कपाट खुलने से पहले ही वहां से चला गया हो।

मंदिर के शक्तिपीठ होने के बारे में कहा जाता है कि जब महादेव देवी सती के भस्मीभूत शरीर को लेकर तीनों लोकों में घूम रहे थे। उस समय भगवान विष्णु ने मां के शरीर को अपने चक्र से खंड-खंड कर दिया था। कहा जाता है कि उस समय विध्याचल की इस चोटी पर मां का हार गिरा था यही वजह है कि इस जगह को मैहर यानी कि मां का हार का नाम दिया गया। इस तथ्य के बारे में हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है।

आल्हा ऊदल का अखाड़ा

मां शारदा देवी मंदिर परिसर से थोड़ी दूर पर आल्हा ऊदल का अखाड़ा भी स्थित है। इसके अलावा वहां एक तालाब है जिसके बारे में मान्यता है कि दोनों भाई आल्हा और ऊदल इस सरोवर में स्नान किया करते थे। इसके बाद ही मां के दर्शनों के लिए जाते थे। मंदिर आने वाले श्रद्धालु इस स्थान के भी दर्शन करने आते हैं।

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