मंच हो या घर राजीवजी ही डायरेक्ट करते हैं… बिग बी की साली ने खोले सुखी दांपत्य जीवन के राज

भोपाल! कला बड़ी चीज है। थियेटर का हुनर जिसमें आ जाए, वह जीवन के किसी भी पड़ाव पर असफल नहीं हो सकता। एक ही विधा के ज्ञाता दो लोग जब साथ आकर सार्वजनिक और निजी जीवन के रंगमंच की बागडोर संभालते हैं तो दोनों ही क्षेत्र संवर जाते हैं और जीवन को हर लम्हा हसीन हो जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी है फिल्म, थियेटर और टीवी अभिनेता राजीव वर्मा और उनकी धर्मपत्नी रीता वर्मा की। दोनों अपने शौक (थियेटर) के माध्यम से ही एक-दूसरे के करीब आए और उन्हें मिलाने वाला यह माध्यम आज भी उनके साथ है।
घर चलाने के लिए सरकारी सेवा भी ज्वाइन की लेकिन उतनी ही जितनी जरूरत थी। यही वजह है कि जब लगा की नौकरी की जरूरत नहीं है तो वीआरएस लेकर पूर्ण रूप से रंगकर्म में रम गए। रीता वर्मा बताती हैं कि बंगाली परिवार से होने के कारण कलाएं, विशेषतौर से रंगमंच विरासत में मिला था, वहीं राजीवजी भी कला प्रेमी थे।
ऐसे हुई पहली मुलाकात
दोनों ने स्कूलिंग के दौरान ही अभिनय की शुरुआत कर दी थी लेकिन मिले 1973 में। तब स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा संचालित मध्य प्रदेश कला परिषद द्वारा दो माह की थियेटर वर्कशाप का आयोजन किया गया था। इसमें मैं सीखने आई थी और राजीवजी ने भी ज्वाइन किया था। इसमें बी वी कारंत सिखाने आए थे। यहां सीखते हुए हम करीब आए और संस्था बनाकर थियेटर करने लगे। पक्षी ऐसे आते हैं साथ का पहला नाटक था। इसके बाद कई नाटक किए। तीन साल चले प्रेम प्रसंग के बाद 1976 में हम शादी के बंधन में बंध गए। इसके बाद हमने सखाराम बाइंडर, राजा पगला तीन बेटियां, एक जिद्दी लड़की, वक्त के कराहते रंग जैसे कई नाटक किए। कभी बेटी, कभी पत्नी तो कभी बहू बनी लेकिन दोस्त या प्रेमिका का किरदार कभी नहीं मिला।
रीता वर्मा ने बताया कि बच्चे जब थोड़े बड़े हो गए तो 1980 में मैंने केंद्रीय विद्यालय में लेक्चरर के रूप में ज्वाइन कर लिया और इसी बीच राजीवजी मुंबई चले गए। फिल्म इंडस्ट्री में जब काम बढ़ने लगा तो टाउन एंड कंट्री प्नानिंग में विभाग प्रमुख की नौकरी छोड़ दी और भोपाल आना भी कम हो गया था। मैं मुंबई जाती थी, लेकिन नौकरी, बच्चों की पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियों के चलते लगातार रही कभी नहीं। मुझे वहां अच्छा भी लगता था, जबकि मेरी बहन जया बच्चन और बहनोई अभिताभ बच्चन भी वहां थे। राजीवजी के मुंबई में रहने के दौरान भी भोपाल में थियेटर करती रही। मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानती हूं कि इस बीच हमारा रिश्ता कभी प्रभावित नहीं हुआ।
बाद में मैंने भी स्कूल से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। बीते कुछ सालों से राजीवजी मुंबई पूरी तरह से छोड़कर भोपाल आ चुके हैं। दोनों मिलकर भोपाल थियेटर के नाम से संस्था चलाते हैं और खूब रंगकर्म कर रहे हैं। पहले उन्होंने खूब काम किया अब मैं कर रही हूं। अब राजीवजी मेरे नाटकों का निर्देशन करते हैं। वे मंच के साथ-साथ घर पर भी मुझे डायरेक्ट कर रहे हैं।
यूपीएससी की तैयारी छोड़ी, फिर लेक्चरर बनी
रीता बताती हैं कि एमए करने के बाद मैंने आइएएस की तैयारी शुरू कर दी थी और राजीवजी आर्किटेक्ट के पद पर थे। शादी से पूर्व एक बार उन्होंने कहा कि आप आइएएस बनकर मेरी अफसर बन जाएंगी। उनका इतना कहना था कि मैंने आइएएस की तैयारी छोड़ दी थी। इसके बहुत दिनों बाद सेंट्रल स्कूल में अंग्रेजी की लेक्चरर के रूप में ज्वाइन किया था। हम दोनों में झगड़ा भी होता है और असहमति भी बनती है, लेकिन होता वहीं है जो मैं चाहती हूं और मैं हमेशा सही सोचने की कोशिश करती हूं। घर के कामों में भी पूरा सहयोग करते हैं। खाना बना लेते हैं और उनकी किट में सुई-धागा तक रहता है। हालांकि उनके हाथ का खाना मुझे पसंद नहीं है।
जिम्मेदारी निभाई, शौक पूरे किए
वहीं राजीव वर्मा कहते हैं कि अतिशयोक्ति नहीं होगी की रीता वर्मा इस समय प्रदेश की एकमात्र महिला रंगकर्मी हैं, जो सबसे अधिक आयु में वरिष्ठ और सक्रिय रंगकर्मी हैं। कला के मंच से हम दोनों जीवन के रंगमंच पर साथ आए। जब समान उद्देश्य और शौक वाले दो लोग साथ आते हैं तो कई कठिनाइयां अपने आप हल हो जाती हैं। समानता के चलते एक-दूसरे की हेल्प भी कर पाते हैं। रीताजी का प्रोत्साहन न मिलता तो मैं मुंबई में रहकर फिल्में और टीवी सीरियल न कर पाता। हमने एक-दूसरे के साथ अपने बच्चों, अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियां भी निभाईं और साथ-साथ अपने शौक भी पूरे किए।


