हाई कोर्ट ने तय किया था कि परीक्षा से भर्ती होने वाला कर्मचारी संविदा से ऊपर होता है

ग्वालियर। अधिवक्ता डीपी सिंह, 1999 से वकालत के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उन्होंने 24 साल के करियर में कई महत्वपूर्ण फैसले कराए, लेकिन एक ऐसा फैसला कराया, जो कि उन्हें हमेशा याद रहता है। वह फैसला दूसरों के लिए भी नजीर बना। कानून बिंदू भी इसमें तय हुए। यह केस भी उनके करियर का यादगार केस बन गया।
अधिवक्ता डीपी सिंह ने बताया कि मामला 1986 का है। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ने जेल में विधि अधिकारी की भर्ती विज्ञापन निकाला था। जब इसकी परीक्षा होने के बाद रिजल्ट घोषित किया गया तो शांतिलाल खुराना मेरिट लिस्ट में तीसरे व महेंद्र चौधरी पांचवे नंबर पर थे। संविदा कर्मचारियों की याचिका पर ट्रिब्यूनल ने उनकी भर्ती पर रोक लगा दी। इस कारण दोनों को नियुक्ति नहीं मिल सकी। इनका केस ट्रिब्यूनल से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक गया। उन्हें 2006 में जीत मिली। हाई कोर्ट ने तय किया कि परीक्षा पास करके जिसकी नियुक्ति है, वह संविदा कर्मचारियों से ऊपर है। शासन ने उन्हें नियुक्ति नहीं दी है तो उसमें नियुक्ति देने का 12 महीने का प्रविधान लागू नहीं होगा, क्योंकि शासन ने उन्हें नियुक्ति नहीं दी थी।
ऐसे तय हुआ मुकदमा
पीएससी के माध्यम से विधि अधिकारी के पद भरे जाने की प्रक्रिया हुई और रिजल्ट आया तो उदय प्रताप सिंह ने ट्रब्यूनल में केस दायर किया। उदय प्रताप सिंह ने याचिका दायर करते हुए तर्क दिया था कि पहले संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जाए। इस याचिका को संज्ञान में लेते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी। उसके बाद शांतिलाल व महेंद्र चौधरी ने आवेदन दिया, ट्रिब्यूनल ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। यह मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो उदय प्रताप सिंह की याचिका खारिज हो गई।
– शांतिलाल व महेंद्र प्रताप सिंह ने भी याचिका दायर की। 2006 में इनकी याचिका में फैसला आया। कोर्ट ने आदेश दिया कि शासन ने गलत मंशा के तहत दोनों की नियुक्ति को रोका है। परीक्षा पास करके नियुक्ति दी जानी चाहिए थी, उसे गलत तरीके से रोका गया।
– एकल पीठ के आदेश के खिलाफ शासन ने युगल पीठ में रिट अपील दायर की। शासन का तर्क था कि नियुक्ति 12 महीने के भीतर दी जा सकती है, लेकिन दोनों को लंबा समय हो गया है। इसलिए नियुक्ति नहीं दी जा सकती है। इनकी उम्र भी 50 साल के ऊपर हो चुकी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियुक्ति देने में शासन की गलती रही है। पीड़ित अपनी नियुक्ति को लेकर प्रयासरत हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का भी उल्लंघन है। शासन सुप्रीम कोर्ट में भी एसएलपी दायर की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिल सकी।


