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मध्यप्रदेश

मेहनत ही वह चाभी है मेरे दोस्त… जो जिंदगी का हर ताला खोल देती है

इंदौर। व्यापार करना हर कोई चाहता है और उसके लिए वह मेहनत भी करता है, मगर सफलता उसी को मिलती है, जो कुछ सिद्धांतों को साथ लेकर अपने पथ पर बढ़ता है। फिर चाहे बात व्यापार के नियमों की हो या व्यवहार के नियमों की। व्यवहार केवल वही नहीं, जिसमें आप सभी से प्रेम से बोलें, बल्कि कई बार आपको नियमों को पालने के लिए सख्ती से भी बात करना पड़ती है, तो कभी मानवता के हित में भी कदम उठाना पड़ता है। मगर सबसे आवश्यक है ईमानदारी का गुण। यह ईमानदारी, जिससे आप कुछ ले रहे हैं, उसके प्रति भी और जिस तक पहुंचा रहे हैं, उसके प्रति भी होना चाहिए।

उद्योगपति व समाजसेवी डा. दिवाकर शाह ने सफलता के मंत्र बताए। उन्होंने कहा कि एक बार यदि विश्वास टूटा, तो फिर उसे बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसका नुकसान व्यापार-व्यवसाय में तो उठाना ही पड़ता है, जीवन में भी होता है। व्यापार और जीवन, दोनों की बेहतरी का यही मंत्र है कि परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की कला सीख लो। दिक्कतों से घबराने के बजाय उनसे अनुभव लेकर आगे बढ़ने की ललक होनी चाहिए। मैं भी इन्हीं जीवन मंत्रों और सूत्रों को अपनाकर आगे बढ़ा हूं। पिताजी ने जो व्यापार शुरू किया था, उसे अपने इरादे, मेहनत, लगनशीलता और नीतियों को समझते हुए किया, तो प्रभु कृपा से आज हमारा काम दुनिया के कई देशों तक है।

अपनी क्षमता को देख आगे बढ़ाएं कदम

नईदुनिया सिटी से बातचीत में डा. शाह कहते हैं- अहमदाबाद से पिता बोगीलाल शाह 1940 में इंदौर आए थे। यहां उन्होंने 1962 में जड़ी-बूटियों का कार्य शुरू किया। शहर से प्रदेश, फिर देश और बाद में विदेश तक उन्होंने इसे पहुंचाया। हालांकि, वे कभी विदेश नहीं गए थे, इसलिए जिस मुकाम पर उद्योग पहुंच सकता था, वहां तक पहुंचाने की बारी मेरी थी। एमबीबीएस करने के बाद मुझे लगा कि पिता के द्वारा तैयार किए गए व्यापार को संभालना और आगे बढ़ाना चाहिए। उनके साथ 1975 में काम में हाथ बंटाना शुरू किया और चंद वर्षों में ही जड़ी-बूटियों का निर्यात कई देशों में होने लगा। दो-तीन कंपनियों से पिताजी ने हाथ मिलाया था, पर मुझे लगता था कि हमारे भीतर और अधिक क्षमता है। तब हमने उस दिशा में और तेजी से कदम बढ़ाए।

परेशानियों से हार नहीं मानना

हालांकि, तब कारोबार में दिक्कतें बहुत थीं। आवागमन, शासकीय नीति-नियम व विदेशी मुद्रा की अड़चनें थीं। इंदौर से दिल्ली-मुबंई जाने के लिए भी हमें रतलाम या खंडवा से ट्रेन मिला करती थी। किंतु व्यापार में सफलता का पहला मंत्र यही है कि इन परेशानियों से हार नहीं मानना है। यह गुण मैंने अपने पिताजी से पाया। 1980 में फाइन रसायन का कार्य शुरू किया और 1998 में पीथमपुर में दवाई कंपनी के साथ भी हाथ मिलाया। 2017 तक तमाम व्यापार-व्यवसाय करने के बाद लगा कि अब इससे सेवानिवृत्त होकर पूरी तरह से समाज सेवा करना चाहिए। तब मैं समाज के लिए जुट गया।

समाज से जो मिला, उससे ज्यादा समाज को दें

मैं और मेरी पत्नी, दोनों का यही मानना है कि जितना समाज ने आपको दिया है, उससे ज्यादा ही आपको समाज को लौटाना चाहिए। कंपनी में सीएसआर गतिविधि भले ही सरकार तय करे, लेकिन यह हमारा दायित्व है कि उसमें निरंतरता बनी रहे। 1977-78 में स्थानकवासी जैन युवक मंडल द्वारा क्लीनिक शुरू किया, तो मुझे वहां करीब 16 वर्ष तक निश्शुल्क उपचार करने का मौका मिला। इसके साथ ही गुजराती समाज से जुड़कर सेवा क्रम जारी रहा। 2001 में इंदौर सोसायटी फार मेंटली चैलेंज्ड संस्था से जुड़ा और ईज तक उसके माध्यम से विशेष बच्चों की सेवा का कार्य जारी है।

व्यापारी और उपभोक्ता के बीच बेहतर संबंध हों

उद्योग में कई बार आपको सीखने का मौका मिलता है, खासतौर पर हानि होने पर। मेरे साथ भी ऐसा हुआ, मगर मैंने उससे सबक ही लिया। व्यापार-व्यवसाय में सफल तभी हो सकते हैं, जब आप उस व्यापार के सभी तकनीकी पक्षों को अच्छे से जानते हों। इसके अलावा अपनी शर्तें साफ तौर पर रख देना चाहिए ताकि विवाद की स्थिति से बचा जा सके। अपनी साख बनाए रखें, क्योंकि यह व्यापार दिलाने और व्यापार के लिए पैसा दिलाने, दोनों में ही मददगार होती है। व्यापारी और उपभोक्ता के बीच संबंध बेहतर होना जरूरी है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि व्यापार में निजी हुआ जाए। कई बार आपको झुकना भी पड़ता है और कई बार मुखर भी होना पड़ता है।

ये हैं शाह की सफलता के मंत्र

  • जो भी करें, ईमादारी से करें
  • किसी से भी किसी तरह की बेईमानी कभी न करें
  • गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए
  • वस्तु के अनुरूप उचित मूल्य ही रखें
  • मोलभाव के चक्कर में न पड़े बल्कि उचित कीमत पर ध्यान दें
  • व्यापार में व्यवहार कुशल होना जरूरी
  • साख बनाकर रखनी होगी

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