यहां पत्थर भी सुनाते हैं महावीर के जीवन की गाथा

ग्वालियर। ग्वालियर दुर्ग स्थित उरवाई गेट पर जैन तीर्थ त्रिशलागिरी पर्वत जैन समाज के लिए किसी बड़े तीर्थ स्थल से कम नहीं है। यहां उकेरी गईं आकृतियों से वे जीवन जीने की कला सीखते हैं। पूरा जैन समाज चार अप्रैल को महावीर जयंती के उल्लास में डूब जाएगा, लेकिन यह भी मानता है कि भगवान महावीर के जन्मोत्सव को मनाने की सार्थकता तब ही सिद्ध होगी जब उनके अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य जैसे लोक कल्याणकारी उपदेशित सिद्धांतों का चिंतन कर जीवन में उतारा जाए। माना जाता है जब मगध की राजधानी वैशाली (बिहार प्रांत) में राजा सिद्धार्थ का राज्य शासन था। उन दिनों मचे हुए कर्म-कांडों, पशु एवं नर बलि और हिंसा की अधिकता से चारों ओर त्राहि-त्राहिथी। समस्त राज्य की प्रजा, किसी महापुरुष (तीर्थंकर) के जन्म की राह देख रही थी। उन्हीं दिनों रानी त्रिशला ने रात्री के अंतिम प्रहर में अत्यंत मनभावना एवं सुहावने स्वप्न देखे। इस स्वप्न की जानकारी राजा सिद्धार्थ को मिलती है। रानी ने जैसा स्वप्न देखा था वैस ही हुआ, उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, उस बालक का नाम वर्धमान रखा गया। कालांतर में वर्धमान ने काफी लंबे समय तक विश्व कल्याण के लिए तप किए, इसलिए उनका नाम च्महावीरज् पड़ गया।
आकृतियों में नजर आता है माता त्रिशला का स्वप्न
रानी त्रिशला का वही स्वप्न ग्वालियर में बड़े ही प्रभावी ढंग से पत्थरों पर उकेरा गया है। जैन समाज के दावे के अनुसार यह विश्व का एकमात्रा ऐसा स्थान है, जहां जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के गर्भ काल से लेकर मोक्ष की गाथा उकेरी गई है। यह कार्य लगभग 700 साल पहले तोमर राजवंश के शासक राजा डूंगर सिंह के शासनकाल में हुआ था। महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक से लेकर मोक्ष कल्याणक का वर्णन पांच प्रतिमाओं में देखने को मिलता है। गोपाचाल पर्वत के न्यासी अजीत वरैया ने कहना है कि ग्वालियर किले के उरवाई गेट के पास जैनतीर्थ त्रिशलागिरी पर्वत न्यास है। यहां माता त्रिशला की विशाल प्रतिमा हैं, जिसे जैन समाज श्रद्धा और विश्वास का स्थल मानता है। इन आकृतियों में भगवान महावीर का संपूर्ण जीवन छिपा हुआ है। जन्म कल्याणक दिवस पर जैन समाज प्रभात फेरी निकालता है। इसमें महिला संगठन, जैन सोशल ग्रुप और भजन मंडलियां शामिल होती हैं। भगवान महावीर के जीवन को चित्रित करती झांकियां जुलूस का मुख्य आकर्षण होती हैं।
त्रिशला माता पर्वत पर आती हैं आराम की मुद्रा में
पर्वत पर त्रिशला माता की मूर्ति है। इसमें मां त्रिशला गर्भ कक्ष में आराम करते नजर आ रही हैं। इसके बाद दूसरी मूर्ति में भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याण दर्शाया गया है। वह अपनी माता त्रिशला की गोद में बैठे हैं। जैन समाज की मानें तो भगवान महावीर स्वामी को इंद्रगण सुमेरु पर्वत पर ले जाने के लिए आते हैं। यहां पर उनका 1008 कलशों से अभिषेक करते हैं। तीसरी की मूर्ति में भगवान महावीर स्वामी की तप करते हुए दिखाया गया है। तप भगवान ज्ञान प्राप्त करने के लिए करते हैं। चौथी मूर्ति में महावीर को ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह ज्ञान का उपयोग लोगों के कल्याण में करते हैं। पांचवी मूर्ति में महावीर को मोक्ष को प्राप्त करते हुए दिखाया है।


