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मध्यप्रदेश

चोरी से नहीं डर तो डीसीपी से लगता है साहब

हाल ही में पदस्थ हुए युवा आइपीएस का थाना और थाना प्रभारियों में जबरदस्त खौफ है। शुभ-लाभ में लगे टीआइ तो तबादले की गुहार लगाने लगे हैं। जिन थाना क्षेत्रों में अपराध हो रहे हैं वो सुबह-सुबह माफी मांगने पहुंच जाते हैं। साहब की न सिर्फ पहली पोस्टिंग है बल्कि छवि भी ईमानदार वाली है। वे रोजमर्रा की होने वाली घटनाओं को गंभीरता से लेते हैं। डीएसआर में चोरी-लूट की घटना देखते ही बीट वालों को निपटाने का फरमान जारी कर देते हैं। बायपास के एक थाना में चोरी से नाराज साहब ने अफसरों को हटाने के आदेश दे डाले। एसआइ साथियों के साथ जा पहुंचा साहब के पास। सफाई दी कि जिस मकान में चोरी हुई वो छह माह से बंद था। हालांकि साहब की सख्ती का विरोध भी होने लगा है। घबराए एक थाना प्रभारी ने स्वयं लाइन का रास्ता चुन लिया है।

आधे इधर जाओ, आधे उधर और बाकी मेरे साथ चलो

फिल्म शोले का यह डायलाग एक थाना प्रभारी पर फिट बैठता है। जोन-2 में पदस्थ इन थाना प्रभारी की कार्यशैली के चर्चे पूरे शहर में हैं। साहब की नौकरी का ज्यादा वक्त भोपाल में बीता है। कार्यवाहक निरीक्षक बनने के बाद पहली पोस्टिंग क्राइम ब्रांच में हुई और बाद में शहर के एक थाने के प्रभारी बन गए। साहब ने आते ही सिपाहियों की बैठक ली और कहा कि मुझे क्षेत्र में हड़कंप मचाना है। लोगों को पता चलना चाहिए कि थाने में नया टीआइ आ गया है। साहब ने सिपाहियों की एक टोली बनाई और कहा कि तुम सबको मेरे साथ ही रहना है। मेरे आने पर थाने और मेरे जाने पर घर जाना है। क्षेत्र में होने वाले छोटे-मोटे घटनाक्रम भी मुझे ही बताने हैं। इस रवैये से थाने का स्टाफ न सिर्फ परेशान है बल्कि समझा बुझाकर थक चुका है।

आंकड़ों के लिए झूठी रिपोर्ट लिखवा रहे थे अफसर

पुलिस आयुक्त मकरंद देऊस्कर का असर थानों में दिखने लगा है। थाना प्रभारी आमजन से मिलने लगे बल्कि एसीपी-एडीसीपी ने भी दूरी घटाकर थाना आना शुरू कर दिया है। बड़ा असर तो लूट की घटनाओं में हुआ जिनमें झूठी रिपोर्ट लिखी जा रही है। आंकड़ों के चक्कर में अफसर लूट को चोरी में बदल देते थे। झपट्टा मारकर लूटे चेन-मंगलसूत्र और फोन को चोरी जाना बता दिया जाता था। आयुक्त ने बैठक लेकर खिंचाई की तो थाना प्रभारियों ने न सिर्फ घटना छुपाना बंद की बल्कि फरियादियों के साथ समय गुजारना शुरू कर दिया। घटनास्थल का दौरा किया और लूट को लूट ही लिखा। यही कारण है कि नौ दिन में 14 एफआइआर दर्ज हो गई। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि अफसर अभी तक आंकड़ों के चक्कर में आमजन की सुनवाई ही नहीं कर रहे थे।

शौचालय पर पुलिस का पहरा

अभी-अभी पलासिया पुलिस कंट्रोल रूम शिफ्ट हुए कमिश्नोरेट के हालात बदले-बदले से हैं। कुछ अफसर तो चकाचक हैं लेकिन कुछ ठगे से महसूस कर रहे हैं। नवागत पुलिस आयुक्त मकरंद देऊस्कर ने पदभार संभालते ही पहला परिवर्तन बैठक व्यवस्था में किया है। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त राजेश हिंगणकर, मनीष कपूरिया सहित मुख्यालय के डीसीपी को भी पलासिया बैठाना शुरू कर दिया। कुछ अफसरों को लक्जरी केबिन मिले लेकिन कुछ को छोटे से कमरे में संतोष करना पड़ रहा है। प्रथम मंजिल पर तो अफसरों को शौचालय पर पहरा लगाना पड़ गया है। सबसे ज्यादा मजे में डीसीपी स्तर के अफसर हैं। एक डीसीपी का केबिन पूरे जिले में चर्चा का केंद्र है। दो डीसीपी रानीसराय पुलिस कंट्रोल रूम जा बैठे जहां अभी तक अतिरिक्त पुलिस आयुक्त बैठा करते थे। हालांकि अफसर अभी इस इंतजार में हैं कि मुख्यालय से स्वीकृति आते ही उनके केबिन भी लक्जरी होंगे।

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