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मध्यप्रदेश

शहर में हो रहे ऐसे शोध जिसका लाभ पूरे देश को मिलेगा

इंदौर। शहर में ऐसी प्रतिभाएं भी है जिन्होंने शोध के लिए ऐसे विषयों का चुनाव किया जिससे समाज को लाभ मिल सकता है। ऐसे कुछ यूनिक शोध जिन्हें इंदौर को आधार बनाकर किया गया वे देश के लिए भी महत्वपूर्ण बन गए हैं। किसी शोध में लोहे को जंग से रोकने के लिए हरित संक्षारक अवरोधक तैयार किया है तो किसी ने पर्यावरण को ध्यान रखा और ऐसे विषय पर कार्य कर रहे हैं जो भारत के लिए नया है। कार्बन का उत्सर्जन कैसे कम कर सकते हैं और इससे कार्बन क्रेडिट कैसे प्राप्त कर सकते हैं।

इस विषय पर शोध कर शहर के उद्योगों को बड़ा लाभ पहुंचाने के उदे्श्य से कार्य किया जा रहा है। एक शोध ऐसा भी है जिससे किचन से निकलने वाले कचरे से बायोप्लास्टिक बनाया जा सकता है। ऐसे ही कुछ खास कार्य करने वाले शोध करने वालों से नईदुनिया सिटी ने बात की।

लोहे को जंग से बचाने के लिए पत्तियों से बनाया अवरोधक

इंदौर के शोधकर्ता डा. जितेंद्र भावसार ने हरित रसायन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट के क्षेत्र में कार्य किया है। उन्होंने पौधों के सत्व का उपयोग कर हरित संक्षारक अवरोधकों का निर्माण किया है।इसमें पुदीना और तंबाकू की पत्तियों के अधिशोषण द्वारा लोहे की सतह पर लगने वाली जंग को 90 प्रतिशत तक कम किया।इस उपलब्धि के लिए वर्ष 2016 का मध्य प्रदेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा युवा वैज्ञानिक पुरस्कार डा. जितेंद्र को प्राप्त हो चुका है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा प्रदत्त परियोजना में कोविड जैसी महामारी के दौरान एक्सपायर्ड दवाई का सफल उपयोग संक्षारक अवरोधक के रूप में करने में सफलता मिलने पर सम्मानित किया गया था।इस समय वे अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है और इस तरह के अन्य क्षेत्रों में शोध कार्य कर रहे हैं।

कार्बन उत्सर्जन कम करने और कार्बन क्रेडिट पर कार्य कर रहे है

प्रोफेसर डा. ऋषिना नातू कार्बन क्रेडिट पर शोध कर रही हैं। उनका कहना है कि जिस तरह से दुनियाभर के देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने पर जोर दे रहे हैं इससे जरूरी हो गया है कि भारत के नागरिक भी इस क्षेत्र में अपना ज्ञान बढ़ाए। इस विषय में फिलहाल भारत में विशेषज्ञ बहुत कम है। ऐसे मैंने इसकी पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए शोध शुरू किया है। एक टन कार्बन उत्सर्जन को कम करके हम एक कार्बन क्रेडिट प्राप्त कर सकते हैं। चूंकि इंदौर, पीथमपुर और देवास में कई उद्योग हैं जो छोटी-छोटी कोशिश करके कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकते हैं। इसके लिए कई तरह के रास्ते हैं जैसे वे अपनी मशीनरी को एडवांस कर सकते हैं। इससे बिजली की खपत कम लगेगी।

बिजली से चलने वाले एसी की जगह पानी से चलने वाले एसी का उपयोग कर सकते हैं। वे अपने आसपास ऐसे पेड़ लगा सकते हैं जिससे वहां का वातावरण बेहतर बना रहे। आफिस के बिजली से चलने वाले उपकरणों को आटोमेशन से जोड़ सकते हैं, ताकि अगर वे उपयोग में नहीं आ रहे हो तो अपने आप बंद हो जाए। सौलर पैनल का उपयोग बढ़ाना होगा। इस तरह के कई उपायों को जानने की कोशिश कर रही हूं। इंदौर नगर निगम कचरे से बायो गैस बनाकर हर साल करोड़ों रुपये कार्बन क्रेडिट से कमा रही है। यह कैसे हो रहा है इसकी भी बारिकी से पड़ताल की है।

कचरे से बायोप्लास्टिक बनाने की प्रक्रिया पर कर रहे कार्य

यंग साइंटिस्ट अवार्डी श्रेया शाह ने किचन वेस्ट से बायोप्लास्टिक बनाने की प्रक्रिया पर काम किया है। उन्होंने बताया कि स्कूल आफ बायोटेक्नोलाजी की लैब में किचन से निकलने वाले फल, सब्जी, ब्रेड और अन्य कचरे के साथ ही ज्यूस निकालने के बाद संतरे और गन्ने के वेस्ट को जांचा। इसमें पाए जाने वाले कार्बन को बैक्टीरिया से प्रोसेस किया। इसमें पाया की इससे बायोप्लास्टिक बनाया जा सकता है। यह पर्यावरण के लिए अनुकूल है। इसे लैबोरेट्रीज में टेस्ट भी करवाया ताकि शोध की पुष्टि हो सके।उन्होंने बताया कि एक बैक्टीरिया होता है बेसीलस नाम का। किचन वेस्ट के फरमेंटेशन के बाद शोध की तो पाया कि यह बायोप्लास्टिक बनाने के लिए जिम्मेदार है। सामान्य तौर पर जो प्लास्टिक उपयोग करते हैं वह पेट्रोलियम इंडस्ट्री के कच्ची सामग्री से बनता है। यह किफायती है लेकिन पर्यावरण के लिए नुकसानदायक होता है।

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