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मध्यप्रदेश

ओटीटी प्लेटफार्म पर असभ्य सीन और भाषा पसंद नहीं- कलाकार यशपाल शर्मा

इंदौर। अपने शानदार अभिनय से सिनेमा जगत में लोहा मनवा चुके कलाकार यशपाल शर्मा ने अब डायरेक्शन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया है। यशपाल ने पचास से अधिक फिल्मों और टीवी सीरियल में काम किया है। उन्हें सबसे अधिक पहचान 2001 में आई लगान फिल्म में लाखा के किरदार से मिली थी। इसके बाद गंगाजल, आरक्षण और शूल जैसी फिल्मों में अपने शानदार अभिनय से फिल्म इंडस्ट्री में खूटा गाड़ दिया।

आजकल उनकी निर्देशन में बनी फिल्म दादा लखमी काफी चर्चा में है। इस फिल्म को 70 से अधिक अंतरराष्ट्रीय और बेस्ट क्षेत्रिय फिल्म का राष्ट्रीय अवार्ड प्राप्त किया है। इसे बनाने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ हरियाणवी सिनेमा को पहचान दिलाना था, क्योंकि रीजनल सिनेमा काफी तेजी से बढ़ रहा है लेकिन हरियाणावी के लिए कोई काम नहीं हो रहा था। इस फिल्म को मैंने चुनौती की तरह लिया और पुरस्कार दिलाया। कई लोगों ने कहा कि फिल्म डूब जाएगी, इसे कोई नहीं देखेगा लेकिन मैंने किसी की एक न सुनी।

जल्द दादा लखमी का आएगा दूसरा पार्ट

दादा लखमी के जरिए मैंने डायरेक्शन की शुरुआत की है। इस फिल्म को लोगों ने खूब सराहा है। अब मैंने इसके दूसरे पार्ट के लिए काम करना शुरू कर दिया है। जल्द ही आपके बीच इसका अगला हिस्सा पेश करूंगा। इस फिल्म को अब हरियाणा तक ही सीमित नहीं रखेंगे बल्कि ज्यादा से ज्यादा सिनेमाघरों और अंतरराष्टरीय स्तर पर ले जाएंगे। फिल्म देखने का मजा सिनेमाघरों में ही आता है। इसलिए मैं इसे ओटीटी रिलीज नहीं करूंगा।

काफी बदल रहा सिनेमा

बालीवुड में भयंकर बदलाव हुआ है। अब फिल्मों को बनाने के लिए बेहतर सुविधाएं हैं। पहले एक-एक सीन को करने के लिए काफी समय लगता था। लोकेशन की समस्या रहती थी। आजकल फिल्म सिटी में मूवी के अधिकतर सीन शूट हो जाते हैं। हमारे समय में मोबाइल नहीं होते थे, काम की कमी थी। एक ही चैनल होता था। आजकल साधन बढ़ गए हैं और देखने के लिए बहुत कुछ है। लोग अपने मोबाइल पर दुनिया भर के सिनेमा को देख रहे हैं। ओटीटी ने इसे और भी सरल बना दिया। फिल्मों को प्रमोट करने के माध्यम भी बढ़ गए हैं।

फिल्मों से हुए बदलाव

सिनेमा में दो दशक से सिनेमा में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। पहले अगल टाइप का सिनेमा होता था। लेकिन धीरे-धीरे सत्या, भेजा फ्राई, लगान, आर्टिकल 15 जैसी फिल्मों की वजह से काफी बदलाव हुआ है। अब हर तरह की फिल्में बन रही हैं।

लोकल टू ग्लोबल फिल्मों की जरूरत

यह फिल्म लोकल टू ग्लोबल है और ऐसी फिल्मों की बहुत जरूरत है। नेशनल और इंटरनेशनल फिल्मों में कुछ अंतर नहीं होता है। जिस फिल्म को अंतरराष्टरीय पुरस्कार मिल जाए वो फिल्म इंटरनेशनल हो जाती है। इसमें भाषा से भी असर नहीं पड़ता है। अगर फिल्म की कहानी अच्छी है तो फिल्म किसी भी भाषा में बनी हो उसमें सबटाइटल डाल दो और फिल्म अंतरराष्ट्रीय हो जाती है।

ओटीटी से हुए क्रांतिकारी बदलाव

कोरोनाकाल के बाद से सिनेमाजगत में क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं। सिनेमा का रूप ही बदल गया। इससे टैलेंटेड लोगों को काम में मिलना शुरू हो गया। नए लोगों का आना शुरू हो गया और सबका काम निखर कर आने लगा। कई डायरेक्टर और एक्टर ओटीटी पर अपने काम को अच्छे से दर्शा पा रहे हैं। मैं भी कई वेब सीरीज में काम कर चुका हूं और आगे आपको कई सिरीज देखने को मिलेंगी।

ओटीटी पर असभ्य सीनों के खिलाफ

ओटीटी पर अच्छा काम हो रहा है लेकिन उसमें एक चीज के खिलाफ हूं मैं। वहां पर उपलब्ध कंटेंट में असभ्य सीनों को दर्शाया जा रहा है। डायलाग्स में गालियों को शामिल किया जा रहा है, जोकि मुझे सही नहीं लगता। ऐसा नहीं होना चाहिए। सिनेमा की गरिमा को बनाकर रखना चाहिए। एंटरटेनमेंट के लिए इस तरह की चीजों को नहीं वेब सीरीज और फिल्मों में नहीं शामिल करना चाहिए।

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