मेहनत के दाम पर सबसे कम उम्र का बने सहायक वन संरक्षक

बिलासपुर । वर्ष 1978 में हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास करने के साथ ही प्री इंजीनियरिंग टेस्ट (पीईटी) दिलाई। मन में इंजीनियर बनने का सपना पाले पढ़ाई भी की और परीक्षा से पहले जमकर मेहनत भी। पीईटी का परिणाम जारी हुआ तो असफलता हाथ लगी। ऐसे लगा जैसे जीती बाजी हार गया। अब कुछ नहीं रह गया। मन में हताशा और निराशा के अलावा कुछ नहीं रहा। निराशा के इस दौर में साइंस कालेज बिलासपुर में बीएससी में प्रवेश लिया। डिग्री भी मिल गई।
बीएससी की डिग्री लेने के बाद रायपुर दुर्गा कालेज से बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स करने प्रवेश लिया। यह वही दौर था जब मेरे जीवन में एक बड़ा बदलाव आया। मेरे जीवनकाल के लिए इससे बड़ा टर्निंग पाइंट और कुछ भी नहीं था। बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई के दौरान ही सहायक वन संरक्षक भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया। उम्र सीमा 19 से 26 वर्ष मांगी गई थी। मेरी उम्र उस समय 20 वर्ष के करीब हो रही थी। मैंने फार्म जमा कर दिया। परीक्षा पैटर्न में पहली बार बदलाव किया गया था।
लिखित परीक्षा का आयोजन किया गया था। इसके पहले बीएससी प्रथम श्रेणी में पास होने वालों को मेरिट के आधार पर चयन कर लिया जाता था। लिखित परीक्षा हो रही थी लिहाजा मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया। परीक्षा की तैयारी में जुट गया। दिसंबर 1982 में लिखित परीक्षा हुई। दो महीने बाद परिणाम आया। सहायक वन संरक्षक के पद पर मेरा चयन हो गया। उस दिन से आजतलक फिर मैंने पीछे मुढ़कर नहीं देखा। मेरे नाम से यह कीर्तिमान आज भी है। भारत वर्ष का सबसे कम उम्र का युवा जिसने सहायक वन संरक्षक की परीक्षा पास की थी। 20 वर्ष की उम्र के पहले ही मैंने परीक्षा पास की और फिर नौकरी में आ गया।
यह कहना है अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत होने वाले एसएसडी बड़गैया का। अपनों के बीच वे नाम से कम साहब के नाम से ज्यादा जाने और पहचाने जाते हैं। वन अफसर बड़गैया बताते हैं कि अविभाजित मध्यप्रदेश में एक और कीर्तिमान उनके नाम पर है। सहायक वन संरक्षक से अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद तक पहुंचने वाले वे इकलौते अधिकारी हैं। सारंगढ़ में पले बढ़े और प्राथमिक शिक्षा गांव में करने के बाद बिलासपुर उनकी कर्मभूमि बनी। अध्ययन अध्यापन से लेकर सेवाकाल के दौरान अधिकांश समय उनका बिलासपुर वन मंडल में ही गुजरा। इसका फायदा भी मिला। वे बताते हैं कि अपने सेवाकाल के 37 वर्षों में से 23 वर्ष बिलासपुर और लोरमी वन मंडल में ही गुजरा है। कुछ समय के लिए रामानुजगंज,रायपुर और कांकेर तबादला हुआ। जहां भी रहे कार्य के प्रति समर्पण के दम पर अपनी गहरी छाप भी छोड़ी।
वन्यप्राणियों के सरंक्षण पर किया फोकसवन्यप्राणियों के संरक्षण से लेकर पर्यटन की दृष्टि से बढ़ावा देने के लिए उन्होंने जमकर काम किया। वे बताते हैं कि वर्ष 2005 में जब उन्होंने बिलासपुर वन मंडल का कार्यभार संभाला उस वक्त कानन पेंडारी में पर्यटकों की संख्या काफी कम थी। साल भर में 40 से 50 हजार पर्यटक ही आते थे। मैंने पर्यटन की दृष्टि से काम करना शुरू किया। वन्यप्राणियों की अदला-बदली पर फोकस करते हुए देश के अन्य चिड़िया घर से वन्यप्राणि मंगवाए। इसका प्रभावी असर भी दिखाई दिया। अब तो मिनी जू का दर्जा भी मिल गया है।
अचानकमार टाइगर रिजर्व इनकी देन
अचानकमार टाइगर रिजर्व के अधीक्षक के पद पर जब नियुक्ति हुई तब इसे नई पहचान देने का काम प्रारंभ किया। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ डब्ल्यूडब्ल्यू टी को आमंत्रण देना। कान्हा को सीधे जोड़ने संबंधी वर्ष 2005 में राज्य शासन व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिखकर अचानकमार टाइगर रिजर्व का दर्जा दिलाने प्रयास प्रारंभ किया। टाइगर रिजर्व के जद में आने वाले गांव के व्यवस्थापन को लेकर भी योजना बनाई और प्रस्ताव सरकार को सौंपा था।
वर्ष 2009 में प्रयास सफल हुआ। टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद विस्थापन का कार्य प्रारंभ हुआ। आदिवासियों को रिजर्व एरिया से निकालकर मैदानी जगह पर बसाहट एक बड़ी चुनौती थी। मेहनत रंग लाई। नवंबर 2010 में व्यवस्थापन को लेकर मशक्कत शुरू की। समझाइश के बाद पांच गांव के आदिवासी मान गए। जून 2010 में इन गांवों को मैदानी इलाके में बसाया गया। प्रत्येक परिवार के एक-एक सदस्य को पांच एकड़ जमीन,पक्का मकान के अलावा सड़क,बिजली ,पानी की व्यवस्था और स्कूल भवन बनाकर दिया गया। उनका कहना है कि जब तक प्रभावित गांव का व्यवस्थापन नहीं होगा वन्यप्राणियों और वहां रहने वाले वनवासियों दोनों को दिक्कतें होती रहेंगी।
पर्यटन के नक्शे पर बारनवापारा हुआ शामिल
अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद पर रहते हुए बारनवापारा को पर्यटन के नक्शे पर शामिल करने के लिए बड़ा काम किया है। बारनवापारा अभ्यारण्य के भीतर तीन बड़े गांव का व्यवस्थापन सबसे बड़ी चुनौती थी। वे बताते हैं कि अचानमार टाइगर रिजर्व के भीतर के गांव के व्यवस्थापन का अनुभव उनके साथ था। लिहाजा तीन गांवों को एक एक साल के भीतर व्यवस्थापन कराने में उसे सफलता मिली। बारनवापारा में पर्यटन की सुविधा विकसित करने के साथ ही आनलाइन बुकिंग का दौर प्रारंभ कराया। अब पर्यटकों की संख्या में भी यहां बढ़ने लगी है।
संयुक्त वन प्रबंधन समिति पर जोर
वन विभाग में एक बड़े ओहदे से सेवानिवृत होने वाले आला अफसर बड़गैया का कहना है कि मेरा अनुभव बताता है कि वन्यप्राणियों की सुरक्षा के साथ ही वन संपदा की सुरक्षा के लिए सबसे कारगार उपाय संयुक्त वन प्रबंधन समिति ही है। इनको बढ़ावा देने की कोशिश होनी चाहिए। जनसहयोग के बिना वन्यप्राणियों का शिकार और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को नहीं रोका जा सकता।

