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धार्मिक

शिव ने पार्वती से विवाह के लिए खाई भांग:

खाई भांग:

जनश्रुतियों में एक कथा है कि भगवान शिव पार्वती से विवाह करने जा रहे थे। उनके गणों को लगा कि शिव तो सांसारिक चीजों से दूर रहते हैं, योगी हैं, बारात छोड़ कहीं और न चले जाएं। सबने भगवान शिव से ही इस बारे में मशविरा किया और तय हुआ कि शिव को कुछ ऐसा खिलाया-पिलाया जाए, जिससे वे खुद को भूल जाएं। तब कैलाश के आयुर्वेदाचार्यों ने भांग खोजी।

भांग पीसी गई और भगवान शिव ने इसे पीकर अपने महाकाल, विराट और योगी रूप को भूलकर साधारण मनुष्य का रूप ले लिया। इसके बाद ही शिव का पार्वती से विवाह हो पाया।

भांग और ठंडाई के बिना हम होली की कल्पना नहीं कर सकते। आइए, होली के इस पावन रंगोत्सव पर भांग का देवों और इंसानों से कनेक्शन, इससे जुड़ी कुछ लोककथाएं और इसके फायदे-नुकसान भी जानते हैं।

भारत से लेकर कंबोडिया तक भांग से शिव के कनेक्शन की कथा

शिव पुराण के मुताबिक, एक बार भगवान शिव गृहस्थ जीवन से दुखी होकर वैराग्य में चले गए। पार्वतीजी को चिंता हुई कि अब परिवार कैसे चलेगा। उन्होंने कई उपाय किए कि भगवान शिव वापस लौट आएं। जब वह वैराग्य से लौटे तो कैलाशवासियों ने भांग पीकर उत्सव मनाया।

इसके अलावा, जब समुद्र मंथन हुआ तो अमृत और विष दोनों निकले। मान्यता है कि अमृत की कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे भांग पैदा हुई। कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर के आसपास रहने वाले लोगों के विश्वास का आधार यही कथा है।

भगवान विष्णु ने भी अपने कष्ट दूर करने के लिए खाई थी भांग

एक बार भगवान विष्णु शिव के पास पहुंचे और कहा कि कोई ऐसा पौधा बताइए, जिससे मेरे शरीर का कष्ट दूर हो जाए। तब शिव ने उन्हें मंदार पर्वत पर मौजूद भांग का पौधा दिया, जिसके सेवन से भगवान विष्णु का कष्ट दूर हुआ। शिव के भांग प्रेम को देखते हुए नगा साधु और अघोरियों में भी भांग का चलन शुरू हुआ।

आयुर्वेद में भांग को ‘विजया’ और ‘सिद्धि’ कहा गया है। ‘विजया’ यानी जीतने वाला, ‘सिद्धि’ यानी शक्तियों को हासिल करने वाला। भांग के पौधे का वैज्ञानिक नाम कैनाबिस सैटाइवा है।

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