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मध्यप्रदेश

गर्भावस्था में योग से गर्भवती और शिशु के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के साथ आध्यात्मिक स्तर का भी विकास

इंदौर। गर्भावस्था का समय बहुत ही खूबसूरत समय होता हैं और साथ ही तकलीफदायक भी रहता हैं। इस समय शरीर में बहुत से शारीरिक मानसिक एवं भावनात्मक बदलाव आते है। इसमें मुख्य रूप से उल्टी, कमर दर्द, नींद न आना, कमजोरी महसूस होना, रक्तचाप का बढ़ना या कम होना इन शारिरिक समस्याओं के साथ मानसिक जैसे गुस्सा आना, ओवर थिंकिंग करना, भविष्य की चिंता करना एवं सब से भावनात्मक रूप से बंधना शामिल है।

इस वजह से गर्भवती के साथ – साथ होने वाले शिशु की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है। योग विशेषज्ञ डा. रिंकू पोरवाल के अनुसार इन सब समस्यओं के लिए योग ही सबसे अच्छी दवा हैं। वर्तमान समय योग का महत्व हर कोई जानता हैं एवं गर्भावस्था में योग करना उतना ही लाभदायक जितना खाना खाना। योग गर्भवती और शिशु के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के साथ आध्यात्मिक स्तर का भी विकास करता हैं।

नियमित योग , आसन , प्राणायाम, ध्यान करने से शरीर मन क्रियाशील होते हैं और प्रसव (डिलीवरी) के समय मन प्रसन्न रहता हैं। गर्भाशय क्रियाशील लचीला बनता हैं और नार्मल डिलीवरी होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं ।

गर्भावस्था के प्रथम माह से डिलीवरी के समय तक अलग माह के अनुसार अलग अलग आसनों का चयन किया जाता हैं जिससे उस माह में होने वाली समस्याओं से बचा जा सके। गर्भावस्था के समय कुछ आसनों का नियमित अभ्यास किया जा सकता हैं। इसमें ताड़ासन, वृक्षासन, वीरासन , त्रिकोणासन, उष्ट्रासन, मर्जरी आसन, सेतुबंध आसन, मरकट आसन प्रमुख है। प्राणायाम में भ्रामरी, अनुलोम विलोम, यौगिक श्वसन, योगनिद्रा, ध्यान, ॐ मंत्र का उच्चारण प्रमुख हैं।

यह सभी आसन, प्राणायाम नियमित करना महिला और उसके होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य किये लाभदायक हैं। इसके अलावा आसन का अभ्यास अपनी सीमाओं को ध्यान में रख किसी योग विशेषज्ञ के निर्देशानुसार ही किये जाने चाहिए।

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